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Rajya Sabha
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राज्य सभा की समितियाँ सामान्य सूचना

प्रस्तावना

संसदीय समितियाँ संसदीय प्रणाली में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ये संसद, कार्यपालिका और आम जनता के बीच की मजबूत कड़ी होती हैं। समितियों की आवश्यकता दो कारणों से होती है। पहला कारण कार्यपालिका की कार्रवाइयों पर विधायिका की ओर से निगरानी की जरूरत होना, जबकि दूसरा कारण यह है कि इन दिनों आधुनिक विधायिका के पास अत्यधिक कार्य होता है और उसके पास उन्हें निपटाने के लिए सीमित समय होता है। इस प्रकार प्रत्येक मामले पर सभा में विस्तृत और सुव्यवस्थित ढंग से जाँच कर पाना और उन पर विचार किया जाना असंभव हो जाता है। यदि इस कार्य को युक्तिसंगत ढंग से ध्यानपूर्वक किया जाना है तो स्वाभाविक रूप से किसी ऐसे अभिकरणों को कुछ संसदीय दायित्व सौंपना होगा जिस पर पूरी सभा को विश्वास हो। इसलिए सभा के कतिपय कार्यों को समितियों को सौंपा जाना एक सामान्य परिपाटी बन गई है। यह इस बात से और भी आवश्यक हो गया है कि समिति के पास उसे भेजे गए किसी मामले के संबंध में विशेषज्ञता होती है। किसी समिति में मामले पर पेशेवर ढंग से और अपेक्षाकृत शांत माहौल में विस्तार से सोच-विचार किया जाता है, मुक्त रूप से विचार व्यक्त किए जाते हैं, और मामले पर गहराई से विचार किया जाता है। अधिकांश समितियों में जनता प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष ढ़ंग से तब संबद्ध होती है जब उनसे सुझावों संबंधी ज्ञापन प्राप्त होते हैं, मौके पर उनका अध्ययन किया जाता है और मौखिक साक्ष्य लिया जाता है जिससे समितियों को निष्कर्ष पर पहुँचने में मदद मिलती है।

समितियाँ विधायिका को उसके दायित्वों के निर्वहन करने और उसके कार्यो को कारगर ढ़ंग से, शीघ्रता से और कुशलता से विनियमित करने में सहायता करती है। समितियों के माध्यम से संसद, प्रशासन पर अपने नियंत्रण और प्रभाव का प्रयोग करती है। संसदीय समितियाँ, कार्यपालिका पर हितकारी प्रभाव डालती हैं। इन समितियों का उद्देश्य प्रशासन को कमजोर करना नहीं है, बजाय इसके ये कार्यपालिका द्वारा प्रयोज्य शक्ति के दुरूपयोग को रोकती हैं। तथापि यह स्मरण रहे कि समितियों के कार्यकरण के संदर्भ में संसद के नियंत्रण का अर्थ प्रभाव है, प्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं; सलाह देना है, आदेश नहीं; आलोचना करना है, बाधा डालना नहीं; जाँच करना है, पहल करना नहीं; और जवाबदेही है; पूर्वानुमोदन नहीं। संक्षेप में, यही समिति प्रणाली बनाए जाने का तर्काधार है। समितियों ने गैर दलगत तरीके से कार्य किया है और उनकी चर्चाएं और निष्कर्ष वस्तुनिष्ठ रहे हैं। इसी कारण से समिति की सिफारिशों को व्यापक तौर पर सम्मान दिया जाता है।
समितियों के प्रकार

राज्य सभा में समितियों की एक सुसंगठित पद्धति विद्यमान है। इन समितियों की नियुक्ति तथा कार्यदल, इनका कार्य तथा कार्य-संचालन के मुख्य तरीके नियमों में विहित उपबंधों तथा सभापति द्वारा समय-समय पर दिये गये निदेशों के अनुसार विनियमित किये जाते हैं। इन समितियों का वर्गीकरण तदर्थ समितियों और स्थायी समितियों के रूप में किया जा सकता है। तदर्थ समितियों का गठन समय-समय पर किन्हीं विशेष विषयों की जांच-पड़ताल करने के लिये किया जाता है। राज्य सभा के प्रकिया संबंधी नियमों में इनका उल्लेख इस नाम से नहीं किया गया है परन्तु ये समितियां एक विशेष प्रस्ताव के जरिए अस्तित्व में आ जाती हैं और इन्हें सौंपे गये विषयों के बारे में सभा को सूचना देने के तुरन्त पश्चात् ये समितियाँ समाप्त हो जाती हैं। तदर्थ समितियां आमतौर पर विधेयकों के संबंध में गठित की गयी प्रवर समितियां तथा संयुक्त प्रवर समितियां होती हैं। तथापि, तदर्थ समितियों का गठन सभा द्वारा कुछ अन्य विशेष विषयों के अध्ययन के लिये भी किया जाता है, जैसे कि 1962 में सभा ने प्रक्रिया संबंधी नियमों पर विचार करने के लिये एक तदर्थ समिति का गठन किया था। 1976 में भी सभा के एक आसीन सदस्य के आचरण की जांच करने के लिए एक अन्य समिति का गठन किया गया था और 1983 में निरंकारियों तथा अकालियों के बीच मेल मिलाप कराने के लिए एक और समिति का गठन किया गया था। एक बार फिर 9 अगस्त, 1995 को रेल वैगन से संबंधित सभी पहलुओं की जाँच करने के लिए एक पन्द्रह सदस्यीय रेल वैगन समिति गठित की गई थी।

दूसरी श्रेणी की समितियों यथा स्थायी समितियों को उनके कार्यों की दृष्टि से मोटे तौर पर चार भागों में बांटा जा सकता है:-

1. जांच-पड़ताल करने वाली समितियां:-

(क) याचिका समिति
(ख) विशेषाधिकार समिति; और
(ग) आचार समिति

2. संवीक्षा करने वाली और नियंत्रण रखने वाली समितियां:-

(क) सरकारी आश्‍वासनों संबंधी समिति
(ख) अधीनस्थ विधान संबंधी समिति; और
(ग) सभा पटल पर रखे गये पत्रों संबंधी समिति

3. सभा के दैनिक कार्य से संबंधित समितियां:-

(क) कार्य मंत्रणा समिति; और
(ख) नियम समिति

4. सभा के प्रबन्ध संबंधी समितियां:-

((क) आवास समिति
(ख) सामान्य प्रयोजन समिति; और
(ग) राज्य सभा के सदस्यों के लिए कम्प्यूटरों का उपबंध संबंधी समिति

लोक सभा की कुछ वित्तीय समितियां भी हैं जिनमें राज्य सभा के सदस्यों को सहबद्ध किया गया है। वे समितियां निम्नलिखित हैं:-

(क) लोक लेखा समिति; और
(ख) सरकारी उपक्रमों संबंधी समिति

संयुक्त संसदीय समितियां भी हैं जिनमें दोनों सभाओं के सदस्यों को प्रतिनिधित्व दिया जाता है। ये समितियां निम्नलिखित हैं:-

(क)   अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के कल्याण संबंधी समिति;
(ख)  लाभ के पदों संबंधी समिति;
(ग)   [रेल उपक्रम द्वारा सामान्य राजस्व में देय लाभांश की दर की समीक्षा करने के लिए   संसदीय समिति] (रेल अभिसमय समिति);
(घ)   महिला अधिकारिता समिति;
(ड.)  ग्रंथालय समिति;
(च)   संसद भवन परिसर में खाद्य प्रबंधन संबंधी समिति;
(छ)   संसद भवन परिसर में राष्ट्रीय नेताओं और संसद्विदों के चित्रों/उनकी प्रतिमाओं की स्थापना संबंधी समिति; तथा
(ज)   संसद भवन परिसर में सुरक्षा मामलों संबंधी समिति।

दोनों सभाओं की कुछ और समितियां भी हैं जिनका गठन विधि के उपबंधों के अधीन किया गया है। उदाहरणार्थ, संसद की दोनों सभाओं की संयुक्त समिति, जिसका गठन संसद सदस्य वेतन, भत्ता और पेंशन अधिनियम, 1954 की धारा 9 (1) के अधीन किया गया है।
लोक लेखा समिति, सरकारी उपक्रमों संबंधी समिति, लाभ के पदों संबंधी समिति और अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के कल्याण संबंधी समिति के लिये राज्य सभा के सदस्यों को सभा द्वारा चुना जाता है, [जबकि अन्य संयुक्त समितियों के लिये सदस्यों को सभापति नाम-निर्देशित करते हैं।] इन समितियों में दोनों सभाओं के सदस्यों की संख्या का अनुपात लगभग इस प्रकार होता है कि दो सदस्य लोक सभा के होते हैं तथा एक सदस्य राज्य सभा का होता है।
राज्य सभा में कार्यरत संसदीय स्थायी समितियों की सूची निम्नलिखित है:-

 

क्रम सं.

समिति का नाम

समिति में सदस्यों की संख्या

1.

कार्य मंत्रणा समिति

11

2.

सभा पटल पर रखे गए पत्रों संबंधी समिति

10

3.

याचिका समिति

10

4.

विशेषाधिकार समिति

10

5.

नियम समिति

16

6.

अधीनस्थ विधान संबंधी समिति

15

7.

सरकारी आश्वासनों संबंधी समिति

10

8.

सामान्य प्रयोजन समिति

निर्धारित नहीं

9.

आवास समिति

10

10.

आचार समिति

10

11.

राज्य सभा के सदस्यों के लिए कम्प्यूटरों का उपबंध करने संबंधी समिति

7

12.

संसद सदस्य स्थानीय क्षेत्र विकास योजना संबंधी समिति

10

सामान्यतया क्रम सं. 1 से 9 पर उल्लिखित समितियों का पुनर्गठन प्रतिवर्ष होता है लेकिन प्रत्येक समिति का कार्यकाल तब तक बना रहता है जब तक नई समिति नाम-निर्देशित नहीं की जाती है। दूसरी ओर क्रम सं. 10 से 12 पर उल्लिखित समितियों का कार्यकाल सामान्यतया बना रहता है और उनमें उत्पन्न होने वाली रिक्तियों को समय-समय पर भरा जाता है। उनका पुनर्गठन राज्य सभा के लिए द्विवार्षिक चुनावों के कारण अनेक रिक्तियां उत्पन्न होने के कारण किया जाता है।
इन समितियों में से प्रत्येक समिति के कार्य आदि संक्षेप में नीचे दिए गए हैं:-

(1)       कार्य मंत्रणा समिति - यह समिति ऐसे सरकारी विधेयकों के प्रक्रम और प्रक्रमों तथा ऐसे अन्य किसी कार्य पर चर्चा करने हेतु समय के आवंटन के संबंध में सिफारिश करती है, जिन्हें सभापति द्वारा सभा के नेता के परामर्श से समिति को भेजे जाने का निर्देश दिया जाता है। यह समिति गैर-सरकारी विधेयकों और संकल्पों के प्रक्रम तथा प्रक्रमों पर चर्चा करने हेतु समय के आवंटन के संबंध में भी सिफारिश करती है। समिति को प्रस्तावित समय-सारणी में यह दर्शाने की शक्ति भी प्राप्त है कि विधेयक के विभिन्न प्रक्रम या अन्य कार्य किस-किस समय पूरे किए जाएंगे। समिति ऐसे अन्य कार्य भी करती है जो उसे सभापति द्वारा समय-समय पर सौंपे जाते हैं। समिति द्वारा निर्धारित राज्य सभा के कार्य की समय-सारणी की सभापीठ द्वारा सभा को जानकारी दी जाती है जिसे तत्पश्चात्, राज्य सभा के संसदीय समाचार भाग-II में अधिसूचित किया जाता है।

(2)     सभा पटल पर रखे गए पत्रों संबंधी समिति - इस समिति का कार्य किसी मंत्री द्वारा किसी पत्र को राज्य सभा के समक्ष रखे जाने के बाद यह विचार करना है कि क्या: (क) संविधान के उन उपबंधों अथवा संसद के किसी अधिनियम अथवा किसी अन्य विधि, नियम या विनियमों का अनुपालन हुआ है जिसके अनुसरण में पत्र को इस प्रकार रखा गया है, (ख) पत्र को सभा के समक्ष रखने में कोई अनुचित विलम्ब हुआ है और यदि हां, तो क्या इस प्रकार के विलम्ब के कारणों को स्पष्ट करने वाला एक विवरण भी पत्र के साथ-साथ सभा के समक्ष रखा गया है, और क्या वे कारण संतोषप्रद हैं, और (ग) पत्र को सभा के समक्ष अंग्रेजी और हिन्दी दोनों में रखा गया है और यदि नहीं तो क्या पत्र को हिन्दी में न रखने के कारणों को स्पष्ट करने वाला एक विवरण भी पत्र के साथ-साथ सभा के समक्ष रखा गया है, और क्या वे कारण संतोषप्रद हैं। समिति, सभा पटल पर रखे गये पत्रों के संबंध में ऐसे अन्य कार्य भी करती है जो इसे सभापति द्वारा, समय-समय पर सौंपे जाते हैं। समिति के प्रतिवेदनों को समिति के अध्यक्ष या उनकी अनुपस्थिति में, समिति के किसी सदस्य द्वारा समय-समय पर सभा में प्रस्तुत किया जाता है।

(3)       याचिका समिति - समिति के कार्य (क) उसे सौंपी गई प्रत्येक याचिका की जांच करना है, और यदि याचिका नियमों के अनुपालन में है तो इसे विस्तृत रूप में या सारांश रूप में, जैसी भी स्थिति हो, परिचालित करने का निर्देश देना; और (ख)  ऐसे साक्ष्य जिन्हें समिति उचित मानती है, लेने के बाद याचिका में की गई विशिष्ट शिकायतों के संबंध में सभा को प्रतिवेदन देना और विचाराधीन मामले से संबंधित ठोस रूप में या भविष्य में ऐसे मामले रोकने के लिए उपचारी उपायों का सुझाव देना है। समिति के प्रतिवेदन समिति के अध्यक्ष या उनकी अनुपस्थिति में किसी अन्य सदस्य द्वारा समय-समय पर सभा में प्रस्तुत किए जाते हैं।

(4)     विशेषाधिकार समिति - यह समिति सभा द्वारा या सभापति द्वारा इसे भेजे गए विशेषाधिकार के प्रत्येक मामले की जांच करती है और प्रत्येक मामले के तथ्यों के अनुसार यह निर्धारित करती है कि क्या किसी विशेषाधिकार का उल्लंघन हुआ है और यदि हां, तो किस प्रकार का उल्लंघन हुआ है और किन परिस्थितियों में ऐसा हुआ है और समिति ऐसी सिफारिशें करती है जिन्हें यह उपयुक्त समळो। समिति सभा को उस प्रक्रिया के संबंध में भी प्रतिवेदन दे सकती है जिसका इसके द्वारा की गई सिफारिशों को लागू करने के लिए अनुसरण किया जा सकता है। समिति के प्रतिवेदन समिति के अध्यक्ष या उनकी अनुपस्थिति में समिति के किसी सदस्य द्वारा समय-समय पर सभा में प्रस्तुत किए जाते हैं। सदन में प्रतिवेदन प्रस्तुत किए जाने के बाद, समिति का अध्यक्ष या उसका कोई भी अन्य सदस्य प्रतिवेदन पर विचार करने का प्रस्ताव उपस्थित कर सकता है। कोई भी सदस्य प्रतिवेदन पर विचार के प्रस्ताव को उस रूप में जिसे अध्यक्ष द्वारा उचित समझ जाए, संशोधन की सूचना दे सकेगा। प्रतिवेदन पर विचार का प्रस्ताव करने के पश्चात् अध्यक्ष अथवा समिति का कोई सदस्य अथवा कोई अन्य सदस्य जैसी भी स्थिति हो, यह प्रस्ताव उपस्थित कर सकता है कि सभा संशोधनों से सहमत है अथवा असहमत है अथवा प्रतिवेदन में अंतर्विष्ट सिफारिशों से सहमत है।
(5)     नियम समिति    -           यह समिति  राज्य सभा के प्रक्रिया और कार्य संचालन विषयक मामलों पर विचार करती है और नियमों में कोई संशोधन अथवा परिवर्धन जो भी आवश्यक समझे जाएं, की सिफारिश करती है। उपसभापति अथवा उनकी अनुपस्थिति में समिति के किसी सदस्य द्वारा समिति के प्रतिवेदनों को समय-समय पर सभा में प्रस्तुत किया जाता है। किसी प्रतिवेदन को प्रस्तुत किए जाने के पश्चात्, प्रतिवेदन पर विचार करने के प्रस्ताव को उपसभापति अथवा उनकी अनुपस्थिति में अध्यक्ष द्वारा नाम-निर्देशित समिति के किसी सदस्य द्वारा उपस्थित किया जाएगा। पूर्व सूचना देकर सदस्य प्रतिवेदन पर विचार करने के प्रस्ताव में संशोधनों को उपस्थित कर सकते हैं। प्रतिवेदन पर विचार करने के प्रस्ताव को उपस्थित किए जाने के पश्चात्, उपसभापति, अथवा उनकी अनुपस्थिति में सभापति द्वारा मनोनीत समिति का कोई सदस्य यह प्रस्ताव उपस्थित कर सकता है कि यह सभा इस बात से सहमत है अथवा प्रतिवेदन में अंतर्विष्ट सिफारिशों, सहित संशोधनों से सहमत है।

(6)     अधीनस्थ विधान संबंधी समिति - इस समिति कार्य यह समीक्षा करना और राज्य सभा को सूचित करना है कि क्या नियम, विनियम, उप-विधि, योजना या अन्य सांविधिक दस्तावेज बनाने के लिए संविधान द्वारा प्रदत्त अथवा संसद द्वारा प्रत्यायोजित शक्तियों का, ऐसे प्रदान अथवा प्रत्यायोजन जो भी स्थिति हो, के भीतर, उचित रूप से उपयोग किया जा रहा है अथवा नहीं। समिति इस तथ्य पर विचार किए बिना कि क्या इसे सभा में रखा जाना अपेक्षित है अथवा नहीं, किसी अधीनस्थ प्राधिकरण को संविधान अथवा संसद द्वारा प्रदत्त विधायी कार्यों के अनुसरण में बने ऐसे नियमों, विनियमों, उप विधि, योजना या अन्य विधिक दस्तावेज की जांच करती है और विशेष रूप से विचार करती है कि: (क) क्या वह संविधान के सामान्य उद्देश्यों के अनुरूप है अथवा उस अधिनियम के अनुसरण में है जिसके अन्तर्गत इसे बनाया गया है; (ख) क्या आदेश में ऐसा कोई मामला अंतर्विष्ट है जिसे समिति की राय में संसद के अधिनियम के भीतर ही उपयुक्त तरह से निपटाना जाना चाहिए था; (ग) क्या इसमें कर लगाना अंतर्विष्ट है; (घ) क्या प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र को रोकता है; (ङ) क्या आदेश में किसी उपबंध को भूतलक्षी प्रभाव दिया गया है; जिसके संबंध में संविधान या अधिनियम जिसके अनुसरण में इसे बनाया गया है, में स्पष्ट रूप से ऐसी कोई शक्ति नहीं दी गई है; (च) क्या इसमें भारत की संचित निधि या सरकारी राजस्व से खर्च शामिल है; (छ) क्या ऐसा लगता है कि इसमें संविधान या उस अधिनियम, जिसके अनुसरण में यह बनाया गया है, द्वारा प्रदत्त शक्तियों का असामान्य या अप्रत्याशित प्रयोग किया गया है; (ज) क्या ऐसा प्रतीत होता है कि इसके प्रकाशन या इसे संसद के समक्ष रखने में अनुचित विलम्ब हुआ है; और (ळा) क्या किसी कारण से इसके स्वरूप या अभिप्राय को स्पष्ट किए जाने की जरूरत है।
समिति उन विधेयकों की जांच करती है जो नियमों, विनियमों, उप-विधि आदि को बनाने की शक्तियां/प्रत्यायोजित करते हैं अथवा ऐसी शक्तियां प्रत्यायोजित करने वाले पूर्ववर्ती अधिनियमों की यह देखने की दृष्टि से संशोधन करती है कि क्या उनमें संसद के समक्ष नियमों, विनियमों, आदि को रखने के संबंध में उचित प्रावधान किए गए हैं। समिति अधिनियम के अधीन बनाए गए अथवा बनाए जाने के लिए अपेक्षित नियमों, विनियमों, उप-नियमों आदि के संबंध में उसको भेजे गए अभ्यावेदनों की जांच करती है। इस समिति के प्रतिवेदनों को समय-समय पर समिति के अध्यक्ष द्वारा और उनकी अनुपस्थिति में समिति के किसी सदस्य द्वारा सभा में प्रस्तुत किया जाता है।

(7)     सरकारी आश्‍वासनों संबंधी समिति  -       समिति के कार्य इस प्रकार है: (क) प्रश्नकाल के दौरान सभा में और विधेयकों, संकल्पों, प्रस्तावों, ध्यानाकर्षण सूचनाओं, आदि पर चर्चा के दौरान समय-समय पर मंत्रियों द्वारा दिए गए आश्‍वासनों, वचनों, वचनबद्धताओं की समीक्षा करना, और (ख) किस हद तक ऐसे आश्‍वासनों, वचनों, वचनबद्धताओं आदि को पूरी तरह अथवा संतोषजनक रूप से कार्यान्वित किया गया है इसकी सूचना सभा को देना और जब इन्हें कार्यान्वित किया गया, तो क्या यह कार्यान्वयन इस प्रयोजन के लिए आवश्यक न्यूनतम समय में पूरा किया गया अथवा क्या इन आश्‍वासनों को कार्यान्वित करने में अत्यधिक विलंब हुआ था, यदि हां, तो उनके कारण क्या थे। समिति आश्‍वासनों, वचनों, वचनबद्धताओं आदि के संबंध में किसी प्रश्न पर समिति द्वारा विचार से संबंधित सभी मामलों के संबंध में समिति अपनी स्वयं की प्रक्रिया निश्चित करती है। समिति के प्रतिवेदनों को समिति के अध्यक्ष अथवा उनकी अनुपस्थिति में समिति के किसी सदस्य द्वारा समय-समय पर सभा में प्रस्तुत किया जाता है।

(8)     सामान्य प्रयोजन समिति  -         सामान्य प्रयोजन समिति, में सभापति, उपसभपति, उपसभाध्यक्ष के पैनल के सदस्य, राज्य सभा की संसदीय स्थायी समितियों के अध्यक्ष, राज्य सभा में मान्यता प्राप्त दलों और समूहों के नेता, और ऐसे अन्य सदस्य शामिल होते हैं जिन्हें सभापति द्वारा नाम-निर्देशित किया जाता है। राज्य सभा के सभापति इस समिति के पदेन अध्यक्ष होते हैं। इस समिति के कार्य सभा के कार्यों से संबंधित ऐसे मामलों पर विचार करना और सलाह देना है जिन्हें समय-समय पर सभापति द्वारा समिति के पास भेजा जाता है।

(9) आवास समिति ——इस समिति के कार्य इस प्रकार है: (i) राज्य सभा के सदस्यों को रिहायशी आवास के आवंटन संबंधी सभी मामलों पर विचार करना, और दिल्ली/नई दिल्ली के आवासों और होस्टलों में दी गयीं सुविधाओं तथा अन्य सुख-सुविधाओं का पर्यवेक्षण करना; तथा (ii) आवासों तथा अन्य सुख-सुविधाओं के संबंध में संसद की दोनों सभाओं के सदस्यों के सामान्य हितों के संबंध में समुचित सिफारिशें देना। इसके लिए यह परिपाटी है कि लोक सभा और राज्य सभा के आवास समितियों के अध्यक्ष साथ-साथ बैठक करते हैं।

(10) आचार समिति ——20 जुलाई, 2004 से प्रभावी राज्य सभा के प्रक्रिया और कार्य संचालन विषयक नियमों में आचार समिति संबंधी नियमों को शामिल किए जाने से, समिति का अधिदेश का दायरा व्यापक हो गया है जिसमें सदस्यों के नैतिक आचरण पर नज़र रखना, सदस्यों के लिए एक आचार संहिता तैयार करना और राज्य सभा को प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के माध्यम से इस संहिता में समय-समय पर संशोधनों अथवा कुछ बातें जोड़ने का सुझाव देना; सदस्यों द्वारा कथित रूप से आचार संहिता का कथित उल्लंघन संबंधी मामलों और साथ ही सदस्य पर किसी अन्य नैतिक दुराचार के संबंधी में लगाए गए आरोप से भी संबंधित मामलों की जांच करना; और सदस्यों को नैतिक स्तर से संबंधित प्रश्नों के संबंध में स्वत: ही अथवा विशेष अनुरोध प्राप्त करने पर सलाह देना शामिल है। सदस्यों द्वारा अनैतिक व्यवहार अथवा अन्य दुराचार अथवा आचार संहिता/नियमों का उल्लंघन किए जाने की बात साबित होने पर समिति को उन पर निन्दा, भर्त्सना, राज्य सभा से एक निश्चित अवधि के लिए निलम्बन और इस प्रकार की कोई अन्य अनुशास्ति अधिरोपित करने की शक्तियां भी प्रदान की गई हैं। समिति में 10 सदस्य हैं और परिपाटी के अनुसार, सभा में अपनी निश्चित संख्या के आधार पर दस प्रमुख दलों के नेताओं का समिति की सदस्यता हेतु आमतौर पर नाम-निर्देशन किया जाता है और यदि ये नेता मंत्री हैं तो उनके स्थान पर दलों के उप-नेताओं को नाम-निर्देशित किया जाता है। अध्यक्ष की नियुक्ति समिति के सदस्यों में से की जाती है। समिति के अध्यक्ष द्वारा अथवा, उनकी अनुपस्थिति में समिति द्वारा प्राधिकृत कोई अन्य सदस्य समिति के प्रतिवेदनों को सभा में समय-समय पर प्रस्तुत करता है।

(11) राज्य सभा के सदस्यों के लिए कम्प्यूटरों की व्यवस्था करने संबंधी समिति ——इस समिति का गठन राज्य सभा के सभापति द्वारा सर्वप्रथम 18 मार्च, 1997 में किया गया था और तब से यह समिति कार्य कर रही है जिसमें रिक्तियों को समय-समय पर भरा जाता है अथवा आवश्यकतानुसार इसका पुनर्गठन किया जाता है। राज्य सभा के उप-सभापति इस समिति के अध्यक्ष हैं। यह समिति राज्य सभा के सदस्यों को कम्प्यूटर प्रदान किए जाने संबंधी सभी पहलुओं पर ध्यान देती है। यह समिति सदस्यों की हार्डवेयर और साफ्टवेयर संबंधी आवश्यकताओं की भी समीक्षा करती है।

(12) संसद सदस्य स्थायी क्षेत्र विकास योजना संबंधी समिति ——चूंकि सदस्यों से संसद सदस्य स्थानीय क्षेत्र विकास योजना के अंतर्गत विभिन्न कार्यों को नहीं करने के संबंध में बहुत सारी शिकायतें प्राप्त हो रही थीं, यह महसूस किया गया कि ऐसा कोई प्रभावशाली निगरानी तंत्र होना चाहिए जिससे एमपीलैड योजना के अंतर्गत परियोजनाओं का उचित और शीघ्र कार्यान्वयन संभव हो सके। इस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए, 5 सितम्बर, 1998 को राज्य सभा में एक दस सदस्यीय समिति का गठिन किया गया। राज्य सभा के उप-सभापति इस समिति के अध्यक्ष हैं।

विभाग-संबंधित संसदीय स्थायी समितियां:- पिछले कई वर्षों से किन्ही प्रकार की विषय संबंधी समितियों अथवा विभाग-संबंधित संसदीय स्थायी समितियों के गठन की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। वस्तुत: 1989 में तीन स्थायी समितियों का गठन किया गया जो कृषि, विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी और पर्यावरण और वन से संबंधित थीं। संसद के प्रति सरकार की जवाबदेही की और पुष्टि हेतु अंतत: 1993 में सत्रह विभाग-संबंधित संसदीय स्थायी समितियों का गठन करने का निर्णय लिया गया जिनमें से प्रत्येक में राज्य सभा के 15 सदस्य और लोक सभा के 30 सदस्य होंगे ताकि केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालय/विभागों का शामिल किया जा सके। जुलाई, 2004 में सात और समितियों के गठन के साथ, यद्यपि इन समितियों की सदस्यता को घटाकर राज्य सभा के 10 सदस्य और लोक सभा के 21 सदस्य कर दी गयी थी, विभाग-संबंधित संसदीय स्थायी समितियों की संख्या बढ़ाकर 24 कर दी गई जिनमें से 8 को राज्य सभा के सभापति के अधिकारक्षेत्र में और 16 को लोक सभा अध्यक्ष के अधिकारक्षेत्र में रखा गया। इन समितियों का गठन और कार्यकरण राज्य सभा के प्रक्रिया और कार्य संचालन विषयक नियमों के नियम 268 से 277 और लोक सभा के प्रक्रिया और कार्य संचालन विषयक नियमों के नियम 331 सी से 331एन द्वारा नियंत्रित है। 24 विभाग-संबंधित संसदीय स्थायी समितियां निम्नलिखित हैं और उन्हें आवंटित मंत्रालय/विभाग उनके नामों के आगे निर्दिष्ट हैं:-T:-  

भाग- 1*

क्रम सं समिति का नाम   मंत्रालय/विभाग
1. वाणिज्य संबंधी समिति   वाणिज्य और उद्योग
2. गृह कार्य संबंधी समिति (1)
(2)
गृह
उत्तर-पूर्व क्षेत्र का विकास
3. मानव संसाधन विकास संबंधी समिति (1)
(2)
(3)
मानव संसाधन विकास
युवक कार्यक्रम और खेल
महिला और बाल विकास
4. उद्योग  संबंधी समिति (1)
(2)
भारी उद्योग और लोक उद्यम
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम
5.  विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पर्यावरण और वन संबंधी समिति (1)
(2)
(3)
(4)
(5)
विज्ञान और प्रौद्योगिकी
अंतरिक्ष
पृथ्वी विन
परमाणु ऊर्जा
पर्यावरण और वन
6. परिवहन, पर्यटन और संस्कृति संबंधी समिति (1)
(2)
(3)
(4)
(5)
नागर विमानन
सड़क परिवहन और राजमार्ग
पोत परिहवन
संस्कृति
पर्यटन
7. स्वास्थ्य और परिवार कल्याण  संबंधी समिति   स्वास्थ्य एवं परिवहन कल्याण
8. कार्मिक, लोक शिकायत, विधि और न्याय संबंधी समिति (1)
(2)
विधि और न्याय
कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन

भाग -IIy  

9. कृषि संबंधी समिति (1)
(2)
कृषि
खाद्य प्रसंस्करण उद्योग
10. सूचना प्रौद्योगिकी संबंधी समिति (1)
(2)
संचार और सूचना प्रौद्योगिकी
सूचना और प्रसारण
11. रक्षा संबंधी समिति   रक्षा
12. ऊर्जा संबंधी समिति (1)
(2)
नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा
विद्युत
13. विदेश मामलों संबंधी समिति (1)
(2)
विदेश
प्रवासी भारतीय कार्य
14. वित्त संबंधी समिति (1)
(2)
(3)
(4)
वित्त
कारपोरेट कार्य
योजना
सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन
15. खाद्य, उपभोक्ता मामले और सार्वजनिक वितरण संबंधी समिति   उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण
16. श्रम संबंधी समिति (1)
(2)
श्रम और रोजगार
वस्त्र
17. पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस संबंधी समिति   पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस
18. रेल संबंधी समिति   रेल
19. शहरी विकास संबंधी समिति (1)
(2)
शहरी विकास
आवास और शहरी गरीबी उपशमन
20. जल संसाधन संबंधी समिति   जल संसाधन
21. रसायन और उर्वरक संबंधी समिति   रसायन और उर्वरक
22. ग्रामीण विकास संबंधी समिति (1)
(2)
ग्रामीण विकास
पंचायती राज
23. कोयला और इस्पात संबंधी समिति (1)
(2)
(3)
कोयला
खान
इस्पात
24. सामाजिक न्याय और अधिकारिता संबंधी समिति (1)
(2)
(3)
सामाजिक न्याय और अधिकारिता
जनजातीय कार्य
अल्पसंख्यक मामले

* राज्य सभा के सभापति के प्रशासनिक क्षेत्राधिकार वाली समितियाँ।

y लोक सभा के अध्यक्ष के प्रशासनिक क्षेत्राधिकार वाली समितियाँ।

प्रथम आठ समितियों के अध्यक्षों की नियुक्ति राज्य सभा के सभापति द्वारा की जाती है और शेष सोलह समितियों के अध्यक्षों की नियुक्ति लोक सभा अध्यक्ष द्वारा की जाती है।

इन विभाग संबंधित संसदीय स्थायी समितियों, जिन्होंने 8 अप्रैल, 1993 से कार्य करना शुरू किया है, ने 1989 में गठित की गई तीन विषयों से संबंधित समितियों का अधिक्रमण किया।

31 मार्च, 1993 को संसद के केन्द्रीय कक्ष में विभाग संबंधित संसदीय स्थायी समिति प्रणाली का उद्घाटन करते समय तत्कालीन भारत के उपराष्ट्रपति और राज्य सभा के सभापति श्री के. आर. नारायणन ने समुक्ति की थी कि इन समितियों का मुख्य प्रयोजन निम्नलिखित है:-

".......इन समितियों में अपेक्षाकृत अधिक विस्तृत विचार-विमर्श के उपायों के माध्यम से संसद के प्रति सरकार की जवाबदेयता सुनिश्चित करना। इसकी मंशा प्रशासन को कमजोर करने अथवा उसकी आलोचना करना नहीं वरन सार्थक संसदीय सहयोग द्वारा इसे सुदृढ़ बनाना है।"

इन समितियों को निम्नलिखित कार्य सौंपे गए हैं:-

(क) संबंधित मंत्रालयों/विभागों की अनुदान मांगों पर विचार करना और उस पर प्रतिवेदन देना। प्रतिवेदन में कटौती प्रस्ताव की प्रकृति जैसा कोई सुझाव नहीं दिया जाएगा;

(ख) सभापति अथव अध्यक्ष, जैसी भी स्थिति हो, द्वारा समिति के पास भेजे गए उससे संबंधित मंत्रालयों/विभागों से संबंधित विधेयकों की जांच करना और उन पर प्रतिवेदन देना;

(ग) मंत्रालयों/विभागों के वार्षिक प्रतिवेदनों पर विचार करना और उन पर प्रतिवेदना देना; और

(घ) यदि सभापति अथवा अध्यक्ष, जो भी स्थिति हो, द्वारा समिति के पास सभाओं में प्रस्तुत किए गए राष्ट्रीय मौलिक दीर्घकालिक नीति संबंधी दस्तावेज भेजे जाते हैं तो उन पर विचार करना और उन पर प्रतिवेदन देना।

शर्त यह कि स्थायी समितियाँ मंत्रालयों/विभागों से संबंधित दिन प्रतिवेदन के प्रशासनिक मामलों पर विचार नहीं करेंगी।
 

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