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Rajya Sabha
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राज्य सभा के विधायी कार्यों पर आलेख

विधेयक क्या होता है

      विधेयक एक प्रारूप संविधि है जो संसद की दोनों सभाओं द्वारा पारित होने तथा राष्ट्रपति द्वारा सहमति दिए जाने के पश्चात् कानून बन जाता है। सभी विधायी प्रस्ताव विधेयक के रूप में संसद के समक्ष लाए जाते हैं।

विधेयकों के प्रकार और उनकी विशिष्ट विशेषताएं

  1. विधेयकों को इस आधार पर कि क्या उसे सभा में किसी मंत्री द्वारा या किसी गैर-सरकारी सदस्य द्वारा प्रस्तुत किया गया है, मुख्य रूप से सरकारी विधेयकों और गैर-सरकारी सदस्यों के विधेयकों के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है।
  2. विषय-सूची के अनुसार, विधेयकों को (क) नये प्रस्तावों, विचारों या नीतियों वाले मूल विधेयक, (ख) विद्यमान अधिनियमों में परिवर्तन, संशोधन या परिशोधन करने वाले संशोधन विधेयक, (ग) किसी विषय विशेष के बारे में विद्यमान कानून/अधिनियमितियों को समेकित करने वाले समेकन विधेयक, (घ) ऐसे अधिनियमों को, जिनकी अवधि, अन्यथा, किसी विनिर्दिष्ट तिथि को समाप्त हो जायेगी, जारी रखने वाले अवसानक विधि (निरंतरता) विधेयक, (ड.) परिनियम पुस्तिका को सुस्पष्ट करने वाले निरसन और संशोधन विधेयक, (च) कतिपय कार्यों को विधि मान्यता प्रदान करने वाले विधिमान्यकरण अधिनियम,     (छ) अध्यादेशों को प्रतिस्थापित करने वाले विधेयक, (ज) धन और वित्तीय विधेयक और (ळा) संविधान संशोधन विधेयकों के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है।
  3. तथापि, प्रक्रिया के अनुसार विधेयकों को (i) साधारण विधेयक (ii) धन विधेयक और वित्तीय विधेयक (iii) अध्यादेशों को प्रतिस्थापित करने वाले विधेयक और (iv) संविधान संशोधन विधेयक के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।
  4. धन विधेयक वे विधेयक हैं जिनमें संविधान के अनुच्छेद 110 के खंड (1) के उप-खंड (क) से (च) में विनिर्दिष्ट सभी या किन्हीं मामलों से संबंधित उपबंध ही अंतर्विष्ट हों। वित्तीय विधेयकों को 'क' और 'ख' श्रेणियों के वित्तीय विधेयक के रूप में भी वर्गीकृत किया जा सकता है। 'क' श्रेणी के विधेयकों में अनुच्छेद 110 के खंड (1) के उप-खंड (क) से (च) में विनिर्दिष्ट किसी भी मामले से संबंधित उपबंध अंतर्विष्ट होते हैं और 'ख' श्रेणी के विधेयकों में भारत की संचित निधि से व्यय अंतर्ग्रस्त होता है।

धन विधेयकों और 'क' श्रेणी के वित्तीय विधेयकों, जिन्हें सिर्फ लोक सभा में ही पुर:स्थापित किया जा सकता है, को छोड़कर शेष विधेयकों को संसद की किसी भी सभा में पुर:स्थापित किया जा सकता है। संविधान के अनुच्छेद 109 के उपबंधों के अनुसार धन विधेयक के संबंध में राज्य सभा के पास सीमित शक्तियां होती हैं। किसी धन विधेयक के लोक सभा द्वारा पारित होने तथा राज्य सभा के पास इसकी सिफारिशों के लिए भेजे जाने के पश्चात् इसे राज्य सभा द्वारा प्राप्ति की तारीख से चौदह दिनों की अवधि के भीतर सिफारिशों सहित या सिफारिशों के बिना ही लोक सभा को वापस भेजा जाना होता है। लोक सभा राज्य सभा की सभी या किसी सिफारिश को स्वीकार या अस्वीकार करने के लिए स्वतंत्र है। यदि लोक सभा राज्य सभा की किसी सिफारिश को स्वीकार करती है तो धन विधेयक को राज्य सभा द्वारा अनुशंसित और लोक सभा द्वारा स्वीकृत संशोधनों के साथ दोनों सभाओं द्वारा पारित माना जाता है। यदि लोक सभा राज्य सभा की किसी भी सिफारिश को स्वीकार नहीं करती है तो धन विधेयक को राज्य सभा द्वारा अनुशंसित किसी संशोधन के बिना ही लोक सभा द्वारा पारित रूप में संसद की दोनों सभाओं द्वारा पारित माना जाएगा। यदि धन विधेयक राज्य सभा द्वारा इसकी प्राप्ति की तारीख से चौदह दिनों के भीतर लोक सभा को नहीं लौटाया जाता है तो इसे उक्त अवधि की समाप्ति के पश्चात् लोक सभा द्वारा पारित रूप में दोनों सभाओं द्वारा पारित माना जाएगा।

  1. 'क' श्रेणी के वित्तीय विधेयक को राष्ट्रपति की सिफारिश पर सिर्फ लोक सभा में पुर:स्थापित किया जा सकता है। तथापि, एक बार लोक सभा द्वारा इसके पारित हो जाने के पश्चात् यह साधारण विधेयक के जैसा हो जाता है और ऐसे विधेयकों के संबंध में राज्य सभा की शक्तियों पर कोई निर्बंधन नहीं रह जाता।
  2. 'ख' श्रेणी के वित्तीय विधेयक और साधारण विधेयकों को संसद की किसी भी सभा में पुर:स्थापित किया जा सकता है।
  3. अध्यादेशों को प्रतिस्थापित करने वाले विधेयक किसी विषय पर संविधान के अनुच्छेद 123 के अधीन राष्ट्रपति द्वारा आशोधन सहित या रहित प्रख्यापित अध्यादेश को प्रतिस्थापित करने के लिए संसद के समक्ष लाये जाते हैं। अध्यादेश के उपबंधों को निरंतरता प्रदान करने के लिए ऐसे विधेयक को संसद के पुन: समवेत होने से छह सप्ताह के भीतर संसद की दोनों सभाओं द्वारा पारित किया जाना होता है और राष्ट्रपति द्वारा सहमति दी जानी होती है।
  4. संविधान में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार, संविधान संशोधन विधेयक तीन प्रकार के हो सकते हैं, अर्थात् (i) ऐसे विधेयक, जिन्हें संसद की प्रत्येक सभा में पारित करने के लिए साधारण बहुमत की आवश्यकता होती है; (ii) ऐसे विधेयक, जिन्हें संसद की प्रत्येक सभा में पारित करने के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है अर्थात् सभा की कुल सदस्यता का बहुमत और उस सभा के उपस्थित एवं मतदान कर रहे दो-तिहाई सदस्यों से अन्यून बहुमत द्वारा (अनुच्छेद 368); और (iii) ऐसे विधेयक, जिन्हें पारित करने के लिए विशेष बहुमत और राज्यों के आधे से अन्यून विधानमंडलों द्वारा उन विधानमंडलों द्वारा इस आशय के पारित संकल्पों द्वारा अनुसमर्थन (अनुच्छेद 368 के खंड (2) का परंतुक) की आवश्यकता हो। अनुच्छेद 368 के अधीन संविधान संशोधन विधेयक संसद की किसी भी सभा में पुर:स्थापित किया जा सकता है और इसे प्रत्येक सभा द्वारा विशेष बहुमत से पारित किया जाना होता है।
  5. संविधान के अनुच्छेद 108 के उपबंधों के अधीन, किसी विधेयक के एक सभा द्वारा पारित किये जाने और दूसरी सभा के पास भेजे जाने के पश्चात् यदि :-

(क) दूसरी सभा द्वारा इसे अस्वीकृत कर दिया जाता है; या
(ख) विधेयक में किये जाने वाले संशोधनों पर दोनों सभाओं में अंतिम रूप से सहमति नहीं बनती है; या
(ग) दूसरी सभा द्वारा विधेयक को पारित किए बिना इसकी प्राप्ति की तारीख से छह मास से अधिक की अवधि व्यपगत हो जाती है, तो
राष्ट्रपति, यदि लोक सभा के भंग होने के कारण विधेयक व्यपगत न हुआ हो, विधेयक पर चर्चा करने और मतदान कराने के प्रयोजनार्थ दोनों सभाओं की संयुक्त बैठक बुला सकते हैं। यदि दोनों सभाओं की संयुक्त बैठक में, संयुक्त बैठक में यथा-सहमत संशोधनों, यदि कोई हो, के साथ विधेयक दोनों सभाओं के उपस्थित एवं मतदान कर रहे कुल सदस्यों के बहुमत द्वारा पारित हो जाता है, तो इसे दोनों सभाओं द्वारा पारित माना जाएगा। तथापि, धन विधेयक  या संविधान संशोधन विधेयक पर संयुक्त बैठक बुलाये जाने का उपबंध नहीं है।

  1. लोक सभा के भंग हो जाने के पश्चात् राज्य सभा में पुर:स्थापित और वहां लंबित विधेयकों को छोड़कर, सभी विधेयक व्यपगत हो जाते हैं।

विधि-निर्माण की प्रक्रिया (विधेयक अधिनियम कैसे बनता है)

    संसद की प्रत्येक सभा में किसी विधेयक के तीन वाचन होते हैं। प्रथम वाचन का संबंध किसी विधेयक को पुर:स्थापित किए जाने से होता है। किसी भी सभा में किसी विधेयक को पुर:स्थापित करने के लिए अनुमति संबंधी प्रस्ताव की स्वीकृति के उपरांत विधेयक को पुर:स्थापित किया जाता है। विभाग-संबंधित संसदीय स्थायी समितियों के गठन के साथ ही निरपवाद रूप से अध्यादेशों को प्रतिस्थापित करने वाले विधेयकों, अनपकारी प्रकृति के विधेयकों एवं धन विधेयकों को छोड़कर सभी विधेयक जांच एवं तीन महीने के भीतर प्रतिवेदन प्रस्तुत किए जाने के लिए इन समितियों को सौंप दिए जाते हैं। किसी विधेयक का अगला चरण अर्थात् द्वितीय वाचन विधेयक के संबंध में दोनों सभाओं को समिति का प्रतिवेदन प्रस्तुत किए जाने के पश्चात् ही शुरू होता है। द्वितीय वाचन में दो अवस्थाएं होती हैं: पहले चरण में सामान्यत: निम्नलिखित प्रस्तावों में से किसी एक प्रस्ताव पर विधेयक के सिद्वांतों और इसके उपबंधों पर चर्चा की जाती है कि विधेयक पर विचार किया जाए; विधेयक को राज्य सभा की प्रवर समिति को सौंपा जाए; विधेयक को लोक सभा की सहमति से दोनों सदनों की संयुक्त समिति को सौंपा जाए; इस पर मत जानने के लिए इसे परिचालित किया जाए; और 'दूसरे चरण' में, विधेयक पर पुर:स्थापित रूप में या प्रवर/संयुक्त समिति द्वारा प्रतिवेदित रूप में खण्डश: विचार किया जाता है। विभिन्न खण्डों पर सदस्यों द्वारा दिए गए संशोधनों को इस चरण मे उपस्थित किया जाता है। तृतीय वाचन प्रस्ताव पर इस चर्चा के संदर्भ में होता है कि विधेयक (या यथासंशोधित विधेयक) को पारित किया जाए या (धन विधेयक के मामले में लोक सभा को) लौटाया जाए जिसमें विधेयक के विपक्ष या पक्ष में आधारित तर्क दिए गए होते हैं। किसी विधेयक के एक सभा द्वारा पारित कर दिए जाने के पश्चात् इसे दूसरी सभा के पास भेजा जाता है जहां यही प्रक्रिया अपनाई जाती है। तथापि, विधेयक को दूसरी सभा में दोबारा पुर:स्थापित नहीं किया जाता। इसे दूसरी सभा के पटल पर रखा जाता है जो इसका वहां प्रथम वाचन होता है।
    • किसी विधेयक के दोनों सभाओं द्वारा पारित हो जाने के पश्चात् इसे राष्ट्रपति के पास उनकी सहमति के लिए प्रस्तुत किया जाता है। राष्ट्रपति, धन विधेयक को छोड़कर, किसी विधेयक पर अपनी सहमति दे भी सकते हैं या नहीं भी दे सकते हैं या पुनर्विचार के लिए विधेयक को लौटा भी सकते हैं। यदि विधेयक को राष्ट्रपति द्वारा किए संशोधनों के साथ या इनके बिना, दोनों सभाओं द्वारा पुन:पारित कर दिया जाता है तो वह अपनी सहमति देने से इंकार नहीं कर सकते। परंतु, जब अपेक्षित बहुमत के साथ दोनों सभाओं द्वारा पारित संविधान संशोधन विधेयक राष्ट्रपति के पास प्रस्तुत किया जाता है तो वह इसे अपनी सहमति दे देंगे।

     कोई विधेयक संसद की दोनों सभाओं द्वारा पारित कर दिए जाने तथा राष्ट्रपति द्वारा सहमति दे दिए जाने के पश्चात् संसद का अधिनियम बन जाता है।