मुख्य सामग्री पर जाएं | स्क्रीन रीडर का उपयोग
लिपि माप:  emailid emailid emailid emailid emailid
Rajya Sabha
आप यहां हैं : [मुख पृष्ठ ]>प्रकियाएँ >राज्य सभा के प्रक्रिया तथा कार्य-संचालन विषयक नियम

प्रस्तावना

संविधान का अनुच्छेद 118 (1) संसद की प्रत्येक सभा को अपनी प्रक्रिया और अपने कार्य संचालन को विनियमित करने के लिए नियम बनाने की शक्ति प्रदान करता है। संविधान के इस उपबंध के अधीन, राज्य सभा ने 2 जून, 1964 को अपनी प्रक्रिया तथा अपने कार्य संचालन को विनियमित करने के लिए नियम स्वीकृत किये। ये नियम 1 जुलाई, 1964 से प्रवृत्त हुए थे।
2. जुलाई, 1972 में इन नियमों में नियम समिति की उन सिफारिशों के अनुसार संशोधन किया गया, जो 10 अप्रैल, 1972 को सभा के समक्ष प्रस्तुत उसके प्रथम प्रतिवेदन में समाविष्ट है। इन संशोधनों का संबंध अन्य बातों के साथ -साथ अधीनस्थ विधान संबंधी समिति के कृत्यों के विस्तारण से भी था ताकि उसे संविधान के अधीन बनाये गये नियमों तथा विनियमों की संवीक्षा करने की शक्ति दी जा सके। सरकारी आश्वासनों संबंधी एक नई समिति का उपबंध भी इन नियमों में किया गया।
3. नियम समिति ने 22 मई, 1979 को राज्य सभा को प्रस्तुत अपने दूसरे प्रतिवेदन में नियमों में और संशोधन करने की सिफारिश की। जिन संशोधनों की सिफारिश की गई उनमें से कुछ संशोधनों का अभिप्राय यह था कि गैर-सरकारी सदस्यों के संकल्पों, अल्पसूचना प्रश्नों के पूछे जाने और सदस्यों द्वारा राज्य सभा में स्थानों के त्यागे जाने की प्रक्रिया के बारे में वर्तमान परिपाटी को नियमों में शामिल किया जाये। समिति ने यह सिफारिश भी की कि राज्य सभा की "सभा पटल पर रखे गये पत्रों" संबंधी एक समिति होनी चाहिए और सदन में आरोप लगाने से पहले सदस्यों से यह अपेक्षा की जानी चाहिए कि वे सभापति और संबद्ध मंत्री को पूर्व सूचना दें।
4. राज्य सभा को 2 दिसम्बर, 1981 को प्रस्तुत अपने तीसरे प्रतिवेदन में समिति ने नियमों में और संशोधनों की सिफारिश की। उनमें से महत्वपूर्ण संशोधन ये थे कि उपसभापति को कार्य-मंत्रणा समिति तथा नियम समिति का सदस्य बनाया जाना चाहिए: यदि शुक्रवार को कोई बैठक न हो तो गैर-सरकारी सदस्यों के कार्य के लिए भी कार्य-मंत्रणा समिति को ही समय आवंटित करना चाहिए जैसा कि वह सरकारी कार्य के मामले में करती है ; गैर-सरकारी सदस्यों के संकल्प का स्वरूप ऐसा हो सकता है, जो राज्य सभा की सम्पत्ति की घोषणा न लगे ; जैसा कि पहले होता था कि राज्य सभा का नेता विशेषाधिकार के प्रश्न को सौंपने का प्रस्ताव उपस्थित करता था, उसके बजाय वह अब प्रश्न उठाने वाले सदस्य अथवा किसी अन्य सदस्य द्वारा उपस्थित किया जाना चाहिये। समिति ने कुछ नियम भी सुझाये हैं, जिनमें प्राधिकारियों से अपेक्षा की गई है कि वे राज्य सभा के सदस्यों की गिरफ्तारी, नजरबंद, रिहाई आदि के संबंध में राज्य सभा के सभापति को सूचना दें।

5. राज्य सभा ने 24 दिसम्बर, 1981 की अपनी बैठक में ऊपर उल्लिखित दूसरे और तीसरे प्रतिवेदनों को स्वीकार कर लिया। ऐसा करते समय सभा ने समिति की कतिपय सिफारिशों को उपान्तरित भी किया तथा नियमों में और संशोधन किये। सभा द्वारा अंतिम रूप से स्वीकृत संशोधनों को सभापति द्वारा 15 जनवरी, 1982 को प्रवर्तन में लाया गया।
6. समिति ने 19 मार्च, 1986 को राज्य सभा में प्रस्तुत किये गये अपने चौथे प्रतिवेदन में नियमों में कुछ और संशोधन किये जाने की सिफारिश की थी। समिति ने नियम 25 के उप-नियम (3) में संशोधन करने की सिफारिश की, जिससे कि विधेयकों की लाटरी निकालने के स्थान पर विधेयकों के भारसाधक सदस्यों के नामों की लाटरी निकाली जायेगी और लाटरी में प्रथम दस स्थान प्राप्त करने वाले सदस्यों से अपने विधेयकों का चयन करने के लिये कहा जायेगा। इसमें यह उपबन्ध भी किया गया है कि कोई भी सदस्य एक सत्र में एक से अधिक विधेयकों पर विचार करने का प्रस्ताव उपस्थित नहीं कर सकेगा। समिति ने नियम 28 के उप-नियम (2) में भी उपयुक्त संशोधन करने की सिफारिश की, चूंकि समिति ने यह महसूस किया कि जिस विधेयक पर चर्चा को अनियत तिथि के लिए स्थगित कर दिया गया हो, उसके बारे में लॉटरी की प्रक्रिया को अपनाया जाना आवश्यक नहीं है तथा ऐसे विधेयक को अन्य विधेयकों से पूर्ववर्तिता प्राप्त होनी चाहिये। नियम 29 के उप-नियम (4) में संशोधन किये जाने संबंधी सिफारिश आनुषंगिक प्रकृति की है। समिति ने प्रक्रिया संबंधी नियमों में एक नये अध्याय अर्थात्, अध्याय 17-ग को अन्त:स्थापित किये जाने की भी सिफारिश की है जिसमें आवास समिति से संबंधित नियमों 212-त से 212-ब को समाविष्ट किया गया है, जो कि राज्य सभा में प्रारम्भ से ही विद्यमान है। किन्तु उन्हें नियमों के मुख्य-संग्रह में शामिल नहीं किया गया है। समिति को इन नियमों में आवास समिति को सम्मिलित न किये जाने का कोई कारण दिखाई नहीं पड़ा और तद्नुसार उसने इसे इन नियमों में सम्मिलित किये जाने की सिफारिश की। सभा ने इन संशोधनों पर 14 मई, 1986 को अपनी सहमति व्यक्त की थी और सभापति द्वारा इन्हें 1 जुलाई, 1986 से लागू किया गया था।

7. 19 अगस्त, 1992 को सभा के समक्ष प्रस्तुत और 20 अगस्त, 1992 को स्वीकृत अपने पांचवें प्रतिवेदन में नियम समिति ने राज्य सभा में तीन संसदीय समितियों अर्थात् (त्) मानव संसाधन विकास संबंधी (त्त्) उद्योग संबधी और (त्त्त्) श्रम संबंधी समितियां गठित करने की सिफारिश की जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय पुनर्निमाण के महत्वपूर्ण क्षेत्रों के साथ संसद सदस्यों की सम्बद्धता को विस्तृत करना और उसमें गुणात्मक घनिष्ठता लाना है ताकि इस संबंध में दोनों सभाओं के सदस्यों के गहन अनुभव और विशेषज्ञता का अधिकतम उपयोग किया जा सके। तथापि, इससे पहले कि इस समिति की सिफारिश को लागू किया जाता, सामान्य प्रयोजन समिति और नियम समिति ने संयुक्त रूप से 23 फरवरी 1993 को विभाग संबंधित स्थायी समिति प्रणाली संस्था के समग्र मामले पर नए सिरे से विचार किया। इस मामले पर 11 मार्च, 1993 को लोक सभा और राज्य सभा अर्थात् दोनों सभाओं की
नियम समितियों की एक संयुक्त बैठक में आगे चर्चा की गई। इस विचार-विमर्श के परिणामस्वरूप, एक व्यापक सर्वसम्मति बनी कि संघ सरकार के विभिन्न मंत्रालयों / विभागों से संबंधित स्थायी समितियां गठित की जाये। इसके अनुसरण में 24 मार्च, 1993 को सभा के समक्ष प्रस्तुत छठे प्रतिवेदन में 17 विभाग संबंधित संसदीय स्थायी समितियों के गठन की सिफारिश की गई थी जिनमें 1:2 अनुपात में क्रमश: राज्य सभा और लोक सभा, दोनों सभाओं के सदस्य शामिल होंगे और इस प्रयोजन के लिए प्रक्रिया संबंधी नियमों में नियम 268 से 277 तक और तीसरी अनुसूची समाविष्ट किये जाने की सिफारिश भी की थी। सभा द्वारा 29 मार्च, 1993 को कुछ संशोधनों सहित यह प्रतिवेदन स्वीकार किया गया और नए नियम उसी दिन से लागू हो गये।

8. नियम समिति ने सभा को 14 फरवरी, 1995 को प्रस्तुत किए गए अपने सातवें प्रतिवेदन में निम्नलिखित संशोधनों की सिफारिश की थी (त्) प्रश्न के लिए सूचना अवधि को पूरे 10 दिन से बढ़ाकर पूरे पन्द्रह दिन करने के लिए नियम 39 में संशोधन (त्त्) प्रश्न को स्पष्ट सटीक, और किसी एक विषय तक सीमित बनाने और प्रश्न के लिए 150 शब्द की सीमा को घटाने के लिए नियम 47 के उपनियम 2 (त्) और 2 (7) में संशोधन (त्त्त्) विधेयक संबंधी प्रवर समिति के प्रतिवेदन पर विसम्मति टिप्पण की भाषा विनिर्दिष्ट करने और समिति के अध्यक्ष को संशोधित उपनियम (6) के अनुरूप न होने वाले शब्दों, पदबंधों अथवा अभिव्यक्तियों का निकालने की शक्ति प्रदान करने के लिए नियम 90 के क्रमश: उपनियम (6) और (7) में परिवर्तन/ समिति ने किसी एक दिन में मौखिक और लिखित उत्तर के लिए प्रश्नों की सीमा नियत करने के लिए नए नियम 51क का अंत:स्थापन करने की भी सिफारिश की थी। समिति का प्रतिवेदन 30 मई, 1995 को कतिपय संशोधनों के साथ स्वीकृत किया गया था। जिन संशोधनों पर अंतत: सभा सहमत हो गई उन्हें सभापति द्वारा 15 जून, 1995 को कार्यान्वित कर दिया गया।
9. समिति ने अपने आठवें और नवीनतम प्रतिवेदन में, जिसे 12 मई, 2000 को सभा को प्रस्तुत किया गया था और 15 मई, 2000 को सभा द्वारा स्वीकृत किया गया, सिफारिश की थी कि (त्) विशेष उल्लेखों को राज्य सभा के प्रक्रिया और कार्यसंचालन विषयक नियमों के दायरे में शामिल किया जाए, समिति ने इस प्रयोजनार्थ नए नियमों 180 ( ङ ) तक का भी सुझाव दिया (त्त्) नियम 168 के अधीन सूचना के लिए प्रपत्र को और सटीक बनाने के लिए उसमें संशोधन किया जाए। (त्त्त्) नियम 168 के अधीन प्रस्ताव की सूचना की जांच/ ग्राह्यता हेतु मानदण्ड को सुदृढ़ बनाने के लिए नियम 169 में नए उपखंड (त्न्) - (न्ध्त्त्त्) जोड़े जांए (त्ध्) नियम 267 के निलम्बन को उस दिन राज्य सभा के समक्ष कार्यावलि से संबंधित होने का सुनिश्चित करने के लिए नियम के निलम्बन से संबंधित प्रस्ताव से संबंधित नियम 267 में संशोधन किया जाए और (ध्) सामान्य प्रयोजन समिति को राज्य सभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन विषयक नियमों के दायरे में शामिल किया जाए, समिति ने सामान्य
प्रयोजन समिति के अभिशासन के लिए नए नियमों 278 -285 का सुझाव दिया। संशोधित नियम 1 जुलाई, 2000 से प्रभावी हो गए।
10. राज्य सभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन विषयक नियमों के वर्तमान संस्करण में अब तक किए गए सभी संशोधनों को शामिल किया गया है। इसमें परिशिष्ट 1 पर "संसद के सदनों ( संयुक्त बैठक तथा संवाद ) संबंधी नियमों", जिन्हें राष्ट्रपति द्वारा भारत के संविधान के अनुच्छेद 118 के खण्ड 3 द्वारा प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करते हुए राज्य सभा के सभापति और लोक सभा के अध्यक्ष के परामर्श से बनाया गया था ; परिशिष्ट पर संविधान की दसवीं अनुसूची ( दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता का का उपबंध ); परिशिष्ट- 3 पर राज्य सभा के सभापति द्वारा संविधान की दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ आठ के संदर्भ में राज्य सभा के सभापति द्वारा बनाए गए " संदर्भ राज्य सदस्य ( दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता ) नियम, 1985", जो 18 मार्च, 1986 से प्रभावी हुए, और परिशिष्ट 4 पर भारत के संविधान से संसद के संबंध में उद्धरण भी शामिल किए गए हैं।

योगेन्द नारायण,
महासचिव, राज्य सभा।