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Rajya Sabha
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वित्तीय विषयों में प्रक्रिया

181. आय-व्ययक

(1) प्रत्येक वित्तीय वर्ष के संबंध में भारत सरकार का वार्षिक वित्तीय विवरण या प्राक्कलित आय और व्यय का विवरण ( जिसे इसके पश्चात् "आय-व्ययक" कहा गया है ) राज्य सभा में ऐसे दिन उपस्थित किया जायेगा जिसका राष्ट्रपति निदेश दे।

(2) आय-व्ययक पर उस दिन कोई चर्चा नहीं होगी जिस दिन वह राज्य सभा में उपस्थित किया जाये।

182. आय-व्ययक पर सामान्य चर्चा

(1) जिस दिन आय-व्ययक उपस्थित किया जाये, उसके बाद सभापति द्वारा नियत किये जाने वाले दिन और उतने समय के लिए जितना कि सभापति इस प्रयोजन के लिए नियम करे, राज्य सभा आय-व्ययक पर सम्पूर्ण रूप से या उसमें अन्तर्ग्रस्त सिद्धान्त के किसी प्रश्न पर चर्चा करने के लिए स्वतंत्र होगी, किन्तु कोई प्रस्ताव उपस्थित नहीं किया जाएगा और न ही आय-व्ययक राज्य सभा में मतदान के लिए रखा जायेगा।

(2) वित्त मंत्री को चर्चा के अन्त में उत्तर देने का सामान्य अधिकार होगा।

(3) सभापति, यदि वह ठीक समळो, भाषणों के लिए समय-सीमा विहित कर सकेगा।

183. आय-व्ययक का भागों में उपस्थापन

इससे पहले अन्तर्विष्ट कोई बात राज्य सभा में आय-व्ययक के दो या उससे अधिक भागों में उपस्थित किये जाने से रोकने वाली नहीं समझी जायेगी और जब ऐसा उपस्थापन हो, प्रत्येक भाग पर इन नियमों के अनुसार उस प्रकार कार्यवाही की जायेगी जैसे कि वह आय-व्ययक हो।

184. कार्य जो वित्तीय कार्य के लिए नियत दिन लिया जा सकेगा

इस बात के होते हुए भी वित्तीय कार्य के लिए कोई दिन नियत किया जा चुका हो, विधेयक या विधेयकों को पुर:स्थापित करने की अनुमति के लिए एक या एक से अधिक प्रस्ताव किये जा सकेंगे और ऐसे दिन राज्य सभा के वह कार्य प्रारम्भ करने से पहले जिसके लिए वह दिन नियत किया गया हो, विधेयक या विधेयकों को पुर:स्थापित किया जा सकेगा।

व्याख्या - वित्तीय कार्य में कोई भी ऐसा कार्य सम्मिलित है, जिसे सभापति संविधान के अन्तर्गत इस वर्ग का ठहराये।

185. संविधान के अनुच्छेद 117 (1) में निर्दिष्ट वित्तीय विधेयकों के संबंध में उपबंध

(1) यदि किसी ऐसे विधेयक को पुर:स्थापित करने की अनुमति के लिए प्रस्ताव की सूचना प्राप्त हो, जिसमें संविधान के अनुच्छेद 117 के खण्ड (1) में उल्लिखित किन्हीं विषयों का उपबंध किया गया हो तो सभापति निदेश दे सकेगा कि इसे कार्यावलि में सम्मिलित नहीं किया जाना चाहिए।

(2) किसी विधेयक के पुर:स्थापन के लिए रखे जाने पर कोई सदस्य उस प्रक्रम पर या उसके पश्चात् किसी प्रक्रम पर आपत्ति कर सकेगा कि संविधान के अनुच्छेद 117 के खण्ड (1) के अर्थान्तर्गत यह विधेयक एक वित्त विधेयक है और इसे राज्य सभा में पुर:स्थापित नहीं किया जाना चाहिए।

(3) यदि सभापति यह ठहराये कि यह विधेयक संविधान के अनुच्छेद 117 के खण्ड (1) के अर्थान्तर्गत एक वित्त विधेयक है तो वह विधेयक पर चर्चा को तुरन्त समाप्त करेगा और निदेश देगा कि इसे कार्यावलि से निकाल दिया जाए और राज्य सभा में विचाराधीन विधेयकों की पंजी से हटा दिया जाये।

(4) यदि सभापति को आपत्ति की वैधता के संबंध में कोई सन्देह हो तो वह उस विषय का निर्देश लोक सभा के अध्यक्ष को करेगा और यदि अध्यक्ष तथा सभापति के बीच कोई सहमति न हो तो सभापति उस विषय की सूचना राज्य सभा को देगा और इस बारे में राज्य सभा का अभिप्राय मालूम करेगा कि क्या वह इस विधेयक के संबंध में आगे कार्यवाही करना चाहती है।

186. धन विधेयक

(1) लोक सभा द्वारा पारित तथा राज्य सभा को पहुंचाया गया कोई धन विधेयक, यथाशीघ्र, पटल पर रखा जायेगा।

(2) सभापति, राज्य सभा के नेता के परामर्श से, विधेयक के इस तरह पटल पर रखे जाने के दो दिनों के भीतर, राज्य सभा द्वारा विधेयक के विचार तथा उसे लौटाये जाने में अन्तर्ग्रस्त सभी या किन्ही प्रक्रमों की पूर्ति के लिए, जिसमें विधेयक के संशोधनों का, यदि कोई हो, विचार तथा पारण भी सम्मिलित है, एक दिन या एक से अधिक दिन या किसी दिन का भाग नियत करेगा।

(3) जब ऐसा नियतन कर दिया जाये तो सभापति, यथास्थिति, नियत दिन या नियत दिनों के अन्तिम दिन निश्चित समय पर प्रक्रम अथवा प्रक्रमों के संबंध में शेष विषयों के निबटारे के लिए, जिसके लिए एक दिन या एक से अधिक दिन या किसी दिन का भाग नियत किया गया हो, सभी आवश्यक प्रस्तावों पर तुरन्त मत लेगा।

(4) यह प्रस्ताव कि विधेयक पर विचार किया जाये, स्वीकृत होने के बाद विधेयक पर खण्डश: विचार किया जायेगा। इस प्रक्रम में विधेयक में वे संशोधन उपस्थित किये जा सकेंगे, जिनकी सिफारिश लोक सभा को की जानी हो, और विधेयकों के संशोधनों पर विचार के संबंध में राज्य सभा के नियमों के उपबंध लागू होंगे।

(5) विधेयक पर खण्डश: विचार किये जाने और संशोधनों का, यदि कोई हों, निबटारा किये जाने के बाद विधेयक का भारसाधक सदस्य प्रस्ताव करेगा कि विधेयक को लौटाया जाये।

(6) जब यह प्रस्ताव कि विधेयक को लौटाया जाए, स्वीकृत हो जाये तो उस स्थिति में जब राज्य सभा कोई सिफारिशें न करे तो इस संदेश के साथ कि राज्य सभा को इस विधेयक के संबंध में लोक सभा को कोई सिफारिशें नहीं करनी हैं और उस स्थिति में जब राज्य सभा किन्हीं संशोधनों की सिफारिश करे तो लोक सभा को सूचना देने वाले इस सन्देश के साथ कि इन संशोधनों की सिफारिश की गई है, विधेयक लोक सभा को लौटा दिया जाएगा।

(7) राज्य सभा में कोई विधेयक पुर:स्थापित किये जाने पर या उसके पश्चात् किसी प्रक्रम में, यदि यह आपत्ति की जाये कि विधेयक अनुच्छेद 110 के अर्थान्तर्गत एक धन विधेयक है और राज्य सभा में इस पर कार्यवाही नहीं की जानी चाहिए, तो सभापति, यदि वह आपत्ति को वैध ठहराये, निदेश देगा कि इस विधेयक के संबंध में आगे कार्यवाही समाप्त कर दी जाये।

(8) यदि सभापति को आपत्ति की वैधता के संबंध में कोई सन्देह हो तो वह उस विषय का निर्देश अध्यक्ष को करेगा, और इस विषय में संविधान के अनुच्छेद 110 के खण्ड (3) के अनुसार उसका निर्णय अन्तिम होगा।